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विभिन्न देश अपना स्वर्ण भण्डार कहाँ रखते हैं ?

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स्वर्ण पादुका, जिसने राजा के समान शासन किया

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चरणपादुका और पदचिन्हों का आदर करने की प्राचीन हिन्दू एवं बौद्ध परम्पराओं की पौराणिक कथाएँ अकसर सुनने को मिलतीं हैं. इस पौराणिक कथा के केंद्र में एक भ्राता की निष्ठा, एक पुत्र की आज्ञाकारिता और प्रिय देवाधिपति के स्वर्ण पादुका की जोड़ी हैं.

रामायण में जैसी कथा है, भगवान राम के भ्राता, भरत ने अयोध्या लौटने पर इसे काफी अस्त-व्यस्त अवस्था में देखा. भरत के पिता, अयोध्या के राजा रुग्णावस्था में मृत्यु शैय्या पर पड़े थे और अयोध्या के सिंहासन के उत्तराधिकारी अपने प्रिय पुत्र राम को, अपने वचन के अनुसार, वनवास पर निर्वासित किया था. दुखी भरत, राम को लौट आने और अधिपति के रूप में शासन करने हेतु मनाने के लिए वन को प्रस्थान कर गए. किन्तु, अपनी पितृभक्ति के कारण राम नहीं माने. अंततः, भरत ने राम की स्वर्ण जडित चरणपादुकाओं (आरंभिक पूर्वजों से लेकर आधुनिक काल तक का पदत्राण) की याचना की और उसे अपने सिर पर रखकर घर को लौट आये. उन्होंने पादुकाओं को सिंहासन पर स्थापित कर दिया और अधिकृत राजा के प्रतिनिधि के रूप में उनकी घोषणा कर दी. जैसी कि कथा है, भरत ने आधिकारिक सत्ता ग्रहण नहीं की, और शीघ्र ही राम स्वयं जगमगाते शहर में वापस आ गए और सिंहासन ग्रहण किया.

इस कथा के अनेक अर्थ और भावार्थ की झलक विभिन्न हिन्दू प्रथाओं में मिलती हैं. उदाहरण के लिए, दीवाली में घर के बाहर देवी लक्ष्मी के पदचिन्ह की छाप या महाराष्ट्र में संत-कवि द्यानेश्वर और तुकाराम के सम्मान में वार्षिक पंढरपुर तीर्थयात्रा को लिया जा सकता है. इसके अलावा गुरु या पुजारी के चरण स्पर्श करने की दैनिक पद्धति उसी भूभाग की परम्परा है, जहां विशेष रूप से बने चरणपादुका तिरुपति मंदिर में चढ़ावा के रूप में देवता को अर्पित किये जाते हैं.

पादुका एक द्विआर्थक शब्द है. यह पूर्व-वैदिक भारत में खड़ाऊँ के लिए था और इसका पदचिन्ह के अर्थ में भी प्रयोग किया जाता है. सुन्दर सचित्र पुस्तक, फीट ऐंड फुटवियर इन ऐन्शन्ट इंडिया के लेखक, जट्टा जैन-नेऊबाउर ने पादुका के क्रमिक विकास में बेडौल आकार के पतले सतह से लेकर उत्तरवर्ती जूतों और मोजरी के लिए बतौर प्रेरणा प्रयुक्त परिष्कृत रूपरेखा की खोज की है. साधारण पुरुष और स्त्रियाँ काष्ठ या लोहे से बने जूते पहनते थे, वहीं राजाओं की पादुका अक्सर संगमरमर या स्वर्ण जडित, अलंकृत रूपरेखा से सज्जित या बहुमूल्य रत्नों से जडित होते थे. राम की स्वर्ण पादुकाओं की कथा एक विशिष्ट हिन्दू संस्कृति और आध्यात्मिक संरचना को आबद्ध करने वाली पौराणिक कथाओं के महासागर में बस एक बूँद भर है.

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