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जब स्वर्ण ने संकट से उबारा

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एक दर्शनीय स्वर्ण सिंहासन

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वक्त के साथ भारत के खोये हुआ तमाम खाजानों में ‘मयूर सिंहासन’ की सुन्दरता और भव्यता का कोई सानी नहीं हो सकता. इतना शानदार सिंहासन जिसकी जटिल बनावट को देखकर समस्त साम्राज्य के सैलानी और इतिहासकार विस्मित रह जाते.

सम्राट शाह जहां का शासन काल मुग़ल साम्राज्य का स्वर्ण युग कहा जाता है. उसका शासन शाहजहाँबाद से संचालित होता था, जहां शानदार दस्तरखान बिछाए जाते थे, धार्मिक उत्सव मनाये जाते थे, और शाही मेहमानों के लिए अतिव्यायी स्वागत समारोह आयोजित किये जाते थे और इन सभी में हमेशा ही सम्राट के जरूरतों का ख्याल रखा जाता था.

उसके शासन काल में उसे महान राजा और जिल्ले इलाही (ईश्वर की छाया) की उपाधि दी गयी थी, जिससे वह ईश्वर की इच्छा का निष्पादक माना जाता था. इस तरह, उसके लिए एक उचित तख़्त या तख़्त-ए-सुलेमान ग्रहण करना आवश्यक था, ताकि उसका शासन मजबूत हो सके.

उसने गिलानी और उसके कारीगरों को तख़्त-ए-सुलेमान के सदृश एक सिंहासन बनाने का आदेश दिया. सिंहासन तक पहुँचने की सीढ़ियों के साथ इसे स्वर्ण और रत्नों से आच्छादित करने की जरूरत थी जहाँ शासक जमीन से ऊपर और जन्नत के करीब दिखाई दे सके.

इस सिंहासन को तैयार करने में साथ वर्ष लगे. इस खूबसूरत सिंहासन को बनाने में ठोस स्वर्ण, बेशकीमती रत्न और मोतियों का इस्तेमाल किया गया था. कोई खर्च बाकी नहीं छोड़ा गया. असल में, इसके निर्माण में ताज महल बनाने से ज्यादा खर्च हुआ था.

शाह जहाँ के गद्दीनसीन होने की सातवीं वर्षगाँठ पर, 22 मार्च 1635 को सिंहासन का उदघाटन किया गया. यह तारीख ज्योतिषियों द्वारा तय की गयी थी और रमजान एवं नौरोज के अंत में ईद-उल-फितर के दिन पड़ने के कारण इसे पवित्र दिन माना गया था.

इस सिंहासन को कुछ ही लोगों को देखने की इजाजत थी, जिनमे बहुत थोड़े से दरबारी, रईस और आगंतुक गणमान्य अथिति सम्मिलित थे. शुरू में इसे तख़्त-मुरासा या रत्न जडित सिंहासन कहा जाता था. लेकिन जब इतिहासकारों ने इस पर बने मयूर की प्रतिमा देखी, तब से इसे मयूर सिंहासन कहा जाने लगा.

जैसा कि इतिहासकार और यात्री अब्दुल हामिद लाहौरी ने लिखा है :

“गुजरते वक्त के साथ, शाही आभूषण भण्डार में अनेक बेशकीमती रत्नों का समावेश होता गया. उनमें से प्रत्येक शुक्र का कुंडल हो सकता था, या सूर्य की मेखला बन सकता था. सम्राट के राज्याभिषेक के बाद उसके मन में आया, जैसा कि दूरदर्शी लोगों का विचार था, इतने दुर्लभ रत्नों और अद्भुत चमक का बस एक ही उपयोग हो सकता है – साम्राज्य के सिंहासन की शोभा बढ़ाना. इसलिए उन्हें इस प्रकार उपयोग में लाना था ताकि देखने वाले इसकी भव्यता का अवलोकन कर सकें और वह वैभव और अधिक आभा के साथ चमक सके.”

दुर्भाग्य से, जब नादिर शाह ईरान का शासक बना, तब उसने होतकी सेना को परास्त करने की ठानी जो रक्षा के लिए भाग कर मुग़ल साम्राज्य में आ गयी. नादिर शाह के लिए आक्रमण करने और साम्राज्य को हारने के लिए यह बहाना काफी था. किन्तु उसे पता था कि वह एक विशाल साम्राज्य नहीं संभाल सकता था और शान्ति के लिए सौदेबाजी की. इसकी कीमत में मयूर सिंहासन भी शामिल था.

कुछ लोगों का मत है कि नादिर शाह की ह्त्या के बाद सिंहासन को इसके रत्नों के लिए तोड़ दिया गया, जबकि दूसरा मत यह है कि इसे ओटोमन सुलतान को भेंट कर दिया गया था. इतिहासकारों के बीच मयूर सिंहासन की विपुल संपदा को लेकर अभी भी विवाद है, किन्तु इसकी तेजस्वी भव्यता के बारे में अनेक लोग सहमत हैं.

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