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सीता की कथा और स्वर्ण मृग

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Mythical story of golden deer in Ramayana

अगर स्वर्ण मृग का आकर्षण नहीं होता, तो लंका का स्वर्णिम राज्य जल कर राख नहीं हुआ होता.

और तब रामायण के महाकाव्य में असाधारण शत्रु, रावण भी नहीं हुआ होता, और न इसके आख्यान में बुराई पर अच्छाई की जीत होती.

वह मृग, जिसने सीता को इतना सम्मोहित किया था असल में स्वर्ण का था या चीतल नामक महज स्वर्णिम धब्बों वाला मृग था, यह अज्ञात रह गया. और इसे ही पौराणिक कथा कहते हैं - आस्था!

वाल्मीकि के रामायण के तीसरे खंड, अरण्यकाण्ड में उस मृग की वर्णन इस प्रकार है :

चमकीले धब्बों वाला एक सुंदर स्वर्ण मृग. एक ऐसा मृग जो चलता तो सैकड़ों रत्नों की झिलमिलाहट उत्पन्न होती थी. नीलमणि, चंद्रकांत, काली आभा, और जम्बुमणि जडि़त इसकी लचकदार स्वर्णिम काया.

और इस तरह कथा आगे बढ़ती है कि यह मृग असल में मारीच नामक एक राक्षस था जिसे राक्षस राजा रावण ने राम द्वारा अपनी बहन सूर्पनखा के अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए लंका के द्वीप राज्य से चुना था. लक्ष्मण ने सूर्पनखा के प्रणय निवेदन को ठुकराते हुए उसकी नाक और कान काट दिए थे. कहा गया है कि क्रोध नरक के समान होता है......

रामायण में इस बिंदु पर राम, लक्ष्मण और सीता पंचवटी के वन में थे. उन्हें अयोध्या से 14 वर्षों के लिए निर्वासित कर दिया गया था.

अन्धकार भरे खतरनाक वन में राम और लक्ष्मण ने सीता के निवास और वन में विचरने वाले वन्य पशुओं, दैत्यों और बुरी आत्माओं से रक्षा के लिए एक छोटा किन्तु सुन्दर आश्रम बनाया था.

मारीच को राम और लक्ष्मण को प्रलोभित करके सीता से दूर ले जाने का दायित्व दिया गया था ताकि रावण धावा बोलकर असहाय सीता को एक हज़ार मील दूर अपने राज्य लंका में ले जा सके.

अतएव मारीच ने सुन्दर स्वर्ण मृग का रूप धारण किया और राम के आश्रम के निकट इस प्रचार चरने लगा ताकि उस पर सीता की दृष्टि पड़ सके.

और ठीक ऐसा ही हुआ. जैसे ही सीता ने सूर्य के सामान चमकते उस स्वर्ण मृग को देखा तो उन्‍होंने अपने पति और देवर से उसे लाने को कहा – जीवित या मृत. वाल्मीकि ने लिखा है कि यदि वह स्वर्ण मृग जीवित मिल गया तो वे उसे पालतू बनाकर अयोध्या ले जायेंगी और यदि मृत हुआ हो उसकी स्वर्णिम खाल अयोध्या में उनके सिंहासन की शोभा बढायेगी.

मारीच कुलांचे भरता हुआ आश्रम से दूर निकल गया और राम उसका पीछा करने लगे. काफी दूर तक पीछा करने के बाद राम ने मृग का वध कर दिया, वह भी स्वर्णिम तीर से ही. मरते हुए मारीच ने राम की आवाज में आर्त्तनाद किया, हे सीता! हे लक्ष्मण!

वहाँ से दूर आश्रम में भयभीत सीता छल का शिकार हो गयीं और लक्ष्मण को राम को ढूँढने को कहा. वह असुरक्षित और अकेली रह गयी, तब रावण भिक्षुक के वेश में आया और उनका अपहरण कर लिया. और इस प्रकार सत्य, न्याय और अपनी प्रिये पत्नी के लिए राम का संग्राम आरम्भ हुआ.

चमकने वाला हर वस्तु स्वर्ण नहीं होता, किन्तु इसके सम्मोहन से भला कौन बच सकता है.

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