स्वर्ण – सहोदर प्रेम की चरम अवस्था

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भाई और बहिन के बीच एक विशेष रिश्ता होता है, एक पल में झगड़ने लगेंगे तो अगले पल शांतिपूर्वक एक-दूसरे की सहायता करने लगेंगे. हिन्दुओं में इस विशेष रिश्ते का त्यौहार साल में दो बार मनाया जाता है - रक्षा बंधन और भाई दूज के अवसर पर.

भाई दूज दिवाली के धूम-धडाके के बाद पूरे देश में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है. इसे अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न नामों के जाना जाता है, जैसे कि ‘भाई पोटा’, ‘भाई बीज’, ‘भाऊ बीज’, ‘भातृ द्वितीया’ या ‘ भातृ दित्या’, किन्तु सभी का महत्व एक ही रहता है.

हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार, मृत्यु के देवता, यमराज काफी लम्बे समय तक अपनी बहिन, यमी से दूर रहने के बाद, इस विशिष्ट दिवस पर उससे मिलने गए. यमी ने उनकी आरती और तिलक के साथ स्वागत किया, उन्हें माला पहनाई और उनके लिए विशेष पकवान बनाए. बदले में यम ने घोषणा की कि कोई भाई जो अपने बहिन से तिलक और आरती प्राप्त करता है, कभी भयभीत नहीं होगा. एक दूसरी कथा में कहा गया है कि जब भगवान कृष्ण नरकासुर का वध करने अपनी बहिन सुभद्रा के पास लौटे, तब उनके बहिन ने भी तिलक, आरती, मिष्टान्न और पुष्प से उनका स्वागत किया था.

इसी कारण से आज भी भाई दूज के दिन बहनें आरती और तिलक अनुष्ठान करतीं हैं. आनंद, स्नेह और सौहार्द लाने वाला यह त्यौहार एक ऐसा अवसर होता है जब भाई- बहिनों को एक-दूसरे के प्रति रिश्ते और प्यार को ताजा करने का सौभाग्य मिलता है.

इस दिन भाई अपने बहिनों के लिए उपहार भी लाते हैं, जो रूपया अथवा स्वर्ण जैसी कोई मूल्यवान वस्तु होती हैं. भाई-बहिनों के बीच भारत के मनपसंद धातु से बने कुंडल, नथिया, कंगन आदि जैसे विभिन्न आभूषणों का प्रचलन सबसे अधिक है. स्वर्ण आभूषण अपनी जटिल बनावट और व्यक्तिगत लगाव के अलावा बढ़िया निवेश भी साबित हो रहां है.

भारत में स्वर्ण का जबरदस्त सम्मान होता है और यह भारत में निवेश के लिए सबसे पसंदीदा विकल्पों में से एक है. दिवाली के समय स्वर्ण खरीदने की परम्परा हज़ारों वर्षों से चली आ रही है और इसका कारण स्पष्ट है. इस पीले धातु पर लम्बी अवधि में बढ़िया प्रतिलाभ प्राप्त होता है. इसके अलावा, संकट के समय यह आर्थिक सुरक्षा के काम भी आता है. इन सभी गुणों के साथ अनंत आकर्षण के कारण स्वर्ण जन समुदाय के बीच लोकप्रिय हो गया है. यह निश्चित ही भाई-बहिनों के लिए है.

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