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इस मंदिर में प्रसाद के रूप में सोना मिलता है!

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वेदों में सोना!

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वैदिक समाज धनी और समृद्ध था। वैदिक महिलाएं सोने और चांदी के आभूषण पहनती थीं। हमें रत्न-नग आदि के संदर्भ भी मिलते हैं। हमने उनके नृत्य और संगीत के बारे में पढ़ा है। स्वाभाविक रूप से, महिलाएं ऐसे अवसर के लिए खुद को तैयार करती होंगी। हालांकि वेद धार्मिक पुस्तकें हैं, लेकिन हमें बहुत-सारी सेक्‍यूलर सामग्री भी उनमें मिलती है। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व की जो भारतीय मूर्तियां हमें मिली हैं, उनमें विभिन्न प्रकार के आभूषण हमें दिखाई देते हैं। मूर्ति के हर अंग पर एक आभूषण है। जब हम यूनानी मूर्तियों को देखते हैं, तो हम पाते हैं कि वे निवस्‍त्र हैं। जब हम सुमेरियाई और बेबीलोनियाई मूर्तियों को देखते हैं तो हमें उन पर बहुत थोड़े आभूषण दिखाई देते हैं। सिर्फ मिस्र की महिलाओं ने हिंदुओं की तरह कुछ आभूषण पहने थे। उन्होंने शायद भारत से आभूषणों या इसकी अवधारणा को अपनाया था।

  1. ऋग्वेद और अन्य वैदिक ग्रंथों में चंद्र ने (आर.वी. 2-2-4, 3-31-5, टी.एस. 1-2-7-1; के.एस. 2-6; वी.एस 4-26; एस.बी. 3-3-3-4) में सोने का संदर्भ है।
    जटरूपा का उपयोग भी सोने को दर्शाने के लिए किया जाता है। सोने के अर्थ में हिरण्य को बहुधा आर.वी. और बाद के ग्रंथों में भी संदर्भ मिलता है।
  2. पृथ्वी से सोने को निकालने की विधि (आर.वी. 1-117-5; ए.वी. 12-1-6; 12-1-26; 12-1-44) वैदिक लोगों को ज्ञात था।
    सोने की धुलाई का उल्लेख तैत्तिरीय संहिता (टी.एस. 6-1-71-) और शतपथ ब्रह्मण (एस.बी. 2-1-1-5) में है। नदी के तल से भी सोना निकाला गया है और इसीलिए आर.वी. (10-75-8) में सिंधु को हिरण्मय कहा गया था। सरस्वती का वर्णन हिरण्यवर्तनी (ए.वी. 6-61-7) के रूप में भी है।
  3. आर.वी. (1-122-2; वी.एस. 15-50) में हिरण्य का अर्थ सोने के आभूषण होता है।
  4. स्वर्ण मुद्रा, सोने का भार — 'अस्त्रापरुद' का उल्लेख कटक संहिता (11-1) और तैत्तिरीय संहिता (3-4-1-4) में किया गया है
  5. शतपथ ब्रह्मण (5-5-3-16) में सोने का सतनाम का अर्थ है 100 कृष्णला (तमिल में कुंथुमनी) होता है।
  6. अयस्क से गलने से सोना प्राप्त होता है (एस.बी. 6-1-3-5; 12-4-3-1)
  7. उपहार के रूप में सोना आर.वी. (6-47-23) में भी मिलता है, जहां हम देखते हैं कि दिवोदास ने सोने के दस ढेले (दासाहिरण्‍यपिंडम) एक पुजारी को दिए थे।
    ब्रहड़ारण्यक उपनिषद में गायों के सींगों से बंधे 1000 सोने के टुकड़ों का भी उल्लेख मिलता है, जो महा ज्ञानी — याज्ञवल्क्य — को पुरस्कार के रूप में मिले हैं। तमिलनाडु में संगम काल तक सोने के हजार टुकड़े दिए जाने का प्रचलन था।
    मेरी टीका-टिप्‍पणी : गलाकर सोने निकालना धातु-शोधन विज्ञान की उन्नति को दर्शाता है। स्वर्ण मुद्रा देश की संपदा को दर्शाती है। दुर्भाग्य से, हमें पहली शताब्दी ईसा पूर्व से ही सोने के सिक्के मिलते हैं। हिंदू अब भी और तब भी सोने को रिसाइकल करते हैं। राजा दिवोदास द्वारा एक पुजारी को सोने की दस बिस्‍कुटों का दिया जाना देश की अकूत संपदा को दर्शाता है। अगर सोने की मुद्रा की पुष्टि कुछ पुरातात्विक खोजों से हो पाती है, तो स्वर्ण मुद्रा का उपयोग करने वाली पहली मुद्रा भारत की होगी।

सोने के बारे में धारणाएं

  1. अथर्ववेद में लोगों की एक धारणा का संदर्भ मिलता है : एक व्‍यक्ति जिसकी बुढ़ापे में मृत्यु होती है, वह वही बन जाता है जो वह पहनता है (सोना... जीवन-भर के लिए, आप के लिए और बल और शक्ति के लिए — कि सोने की चमक के साथ आप लोगों के बीच चमक सकते हैं।
  2. अलंकारों के अर्थ में अंजा या अंजी आर.वी. (1-64-4) में पाया जाता है, लेकिन अलमकारा शब्द पहली बार सतपत ब्रह्मण (3-4-1-36; 13-8-4-7) और चांदोग्य उपनिषद (8-8-5) में आता है।
  3. विवाह पर, पिता द्वारा पुत्री को सोने के आभूषण उपहार में दिए गए थे, उदाहरण के लिए, आर.वी. में निस्का (2-33-10) और कुरिरा (10-85-8) का अर्थ है सिर के आभूषण, कर्णसोभना - कान की बालियां (आर.वी. 8-78-3)। अथर्ववेद ने कौशिका सूत्र (35-11) में तिरिता (8-6-7), परिहस्ता (हाथ ताली) और (ताबीज) का उल्लेख मिलता है।
  4. अथर्ववेद से तात्पर्य है
    प्रवर्ता (कान का आभूषण) 15-2-1
    सोने का ताबीज — 1-35
    निस्‍कारिवा (निस्का के सिक्कों का हार; तमिल में कसुमलई) –5-14-3
    कुरिरा (सिर का आभूषण) — 6-138-2
  5. वाजसनेयी संहिता ने सुनार (30-17) और जौहरी (30-7) मणिकार का उल्लेख मिलता है। एसबी ने रुक्मापासा (6-7-1-7) के रूप में सोने की चेन का उल्लेख मिलता है।
  6. ऋग्वेद में महिलाओं के स्तन (आर.वी. 1-166-10) पर सुनहरे आभूषण वक्षासुरुक्‍मा पहनने का उल्लेख मिलता है।
  7. कहा जाता है कि इंद्र ने अपनी बांहों में सुनहरे रंग के कड़े पहने थे। यह भी कहा जाता है कि मारुति के पास भी सोने के आभूषण थे, जैसेकि किसी अमीर घर के युवा सूदखोर और पुत्र (आर.वी. 5-60-4; 8-5-28; 8-68-3)। अश्विनों को सोने की सीटों वाली कार पर चढ़ने के लिए कहा गया था। शंकायन ग्रह सूत्र में ‘सिमंतोनारायण’ में पत्नी का बहुत सारे सोने के आभूषण पहनकर (1-122-16) खुशी से गाते हुए वर्णन मिलता है।

वैदिक साहित्य में सोना और चांदी के आभूषण, रत्‍नों (मणि) के कई और भी संदर्भ मिलते हैं।

मेरी पाद-टिप्पणी : भारतीय-यूरोपीय भाषाओं में सजातीय शब्दों (सोने, जवाहरात के लिए) का न होना और यूरोप में 1700 ईसा पूर्व (ऋग्‍वैदिक काल) के कुछ रीति-रिवाजों से पता चलता है कि वैदिक सभ्यता भारत में उत्पन्न हुई थी। सोने के सिक्कों को भेंट करने या उपहार में देने की प्रथा सिर्फ भारत में ही देखी गई। वैदिक हिंदू प्रवासी नहीं थे। जैसा कि मैंने पहले उल्लेख किया है कि हम पूरे यूरोप में नाममात्र के आभूषण या कोई आभूषण नहीं की स्थिति पाते हैं। वे सोने के उपहार देने में सक्षम नहीं थे।

वेदों में रत्न नग

  1. आर.वी. (1-33-8) और ए.वी. (1-29-1;2-4-1;8-5-1) में मणि का संदर्भ मिलता है, जो कि रत्न या जवाहरात के लिए हो सकता है। मणि का रत्‍न के रूप में संगम तमिल साहित्य में 400 बार वर्णन मिलता है। इसलिए, हम इसे रत्नों के रूप में ले सकते हैं। टी.एस. (7-3-14-1), के.एस. (35-15), ए.बी. (4-6) में मणि का उल्लेख सभी प्रकार की बुराई के लिए ताबीज के रूप में भी किया गया है।
  2. इसके साक्ष्‍य मिलते हैं कि मणि को धागे (सूत्र) में पिरोया जा सकता है, जिसका उल्‍लेख पंचविंसाब्राह्मण (पी.बी. 20-16-6) और अन्य जगहों (जे.यू.बी. 1-18-8, 3-4-13, जे.बी. 2-248, एस.बी. 12-3-4-2) पर मिलता है (भगवद गीता और संगम तमिल साहित्य में उपमा सूत्र मणिगण्य मिलता है)।
  3. मणि गले में पहनी जाती है : मणिग्रीव (आर.वी. 1-122-14)

  सोने के मानक

  1. सोने का भार सौ दाने (एस.बी. 12-7-2-13), एस.बी. में सौ दाने (एस.बी 13-4-1-6) के भार वाली चार सोने की प्लेटें मिलती हैं।
  2. एस.बी. ने 300 सोने के सिक्कों (एस.बी. 5-5-5-16) के उपहार का उल्लेख मिलता है। सतनाम या सौ कृष्‍णाला के भार का मतलब सौ की माप है (गुंजा के बीज)।
  3. आज भी 'सतनाम' शब्द का प्रयोग उन सभी मंत्रों में किया जाता है, जिनमें उपहार शामिल हैं।
  4. तमिल और अन्य समुदायों में पिछली शताब्दी तक सोने के वजन के लिए गुंजा के बीज (कृष्‍णाला) का उपयोग होता रहा है।
  5. विद्वानों के अनुसार ऋग्वेद में मणि हीरे या मोती को दर्शाता है। दुर्गा ने निरुक्त पर अपनी टीका में कहा है कि यह सूर्य नग (जलते हुए कांच के रूप में प्रयुक्‍त क्रिस्टल) को दर्शाता है।
  6. ऋग्वेद में हिरण्यमणि का अर्थ रत्न जड़ित सोने के आभूषण से हो सकता है। तमिल और संस्कृत साहित्य ने बाद के साहित्य में इसका उल्लेख मिलता है।
स्रोत : स्पीकिंग ट्री

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