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स्वर्ण में उपहार का मोल

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स्वर्ण के सम्बंधित 1991 की अस्तव्यस्त अवस्था

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Gold rescuing economy in 1991 and ahead

जब भी 1991 के वित्तीय संकट की बात चलती है, तब लगभग सभी बातचीत की शुरुआत इस चर्चा के साथ होती है कि किस तरह तत्कालीन वित्त मंत्री, मनमोहन सिंह ने भारतीय अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए विनियम बनाए थे. और यह ठीक भी है, क्योंकि उस समय माहौल पूरी तरह अस्तव्यस्त था. हो सकता है अस्तव्यस्तता शब्द ठीक नहीं हो, बल्कि गोपनीयता कहना सही होगा.

जब देश अपना भुगतान संतुलन हासिल करने में असमर्थ हो गया, और पता चला कि विश्व बैंक के 72 बिलियन डॉलर कर्ज के मुकाबले देश में कुछ ही सप्ताहों का विदेशी मुद्रा भण्डार बचा है, तब सरकार ने देश का 67 टन स्वर्ण (47 टन बैंक ऑफ़ इंग्लैंड को और 20 टन उस समय एक अज्ञात बैंक को) गिरवी रखकर तत्काल 2.2 बिलियन डॉलर का कर्ज लेने का फैसला किया. लोगों को बस इतना पता चला कि स्वर्ण को ज्यूरिख और स्विट्ज़रलैंड भेजा गया है. लेकिन किसके पास और उन देशों में कहाँ भेजा गया, यह अज्ञात था.

संकट के दौरान न्यू यॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, “सरकार ने क्रेता की पहचान खुलासा करने से इनकार कर दिया, लेकिन एक शक्तिशाली भारतीय औद्योगिक घराने द्वारा प्रकाशित अखबार, द बिज़नेस एंड पोलिटिकल आब्जर्वर ने बताया कि भारतीय स्टेट बैंक उक्त स्वर्ण को स्विसएयर के विमान से स्पष्टतः ज्यूरिख भेजा था.”

आज हम जानते हैं कि 600 मिलियन डॉलर प्राप्त करने के लिए 20 टन स्वर्ण यूनियन बैंक ऑफ़ स्विट्ज़रलैंड भेजा गया था.

सरकारी वक्तव्य में कहा गया कि वह स्वर्ण भारत से आरक्षित भण्डार का नहीं था, बल्कि तस्करों से और अवैध निजी जमाखोरों से कई वर्षों में जब्त किया गया स्वर्ण था. यह वक्तव्य अपने स्वर्ण भण्डार पर अत्यधिक गर्व करने वाले देश को आश्वस्त करने और लगातार चल रहे राष्ट्रीय एवं राजनीतिक हंगामा समाप्त करने के लिए दिया गया था.

किन्तु परदे के पीछे अधिकांश राजनेता इस बात से सहमत थे कि यह सही कदम था. द हिन्दू में छपे एक लेख में, भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर, एस. वेंकटरमणन ने राजीव गाँधी से एक बातचीत को स्वीकार किया जिसमे स्वर्गीय प्रधानमन्त्री ने कहा था : “अगर मुश्किल समय में देश के काम आकर राष्ट्रीय उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर सका, तो स्वर्ण की क्या उपयोगिता है?”

नवनियुक्त नरसिम्हा राव सरकार ने पद ग्रहण करने के बाद, लघु एवं ग्रामीण स्तरीय उपक्रमों के विकास के लिए एक व्यापक योजना की घोषणा की. सरकार ने द्वितीय व्यापार नीति पैकेज भी आरम्भ किया और वित्तीय क्षेत्र में सुधार पर सुझाव के लिए एक समिति का गठन किया, जिसके बाद नया कर सुधार लागू किया गया.

इन कदमों के फलस्वरूप भारत ने संकट का मुकाबला किया और 1992-1993 आते-आते अर्थव्यवस्था की स्थिति काफी बेहतर हो गयी. फरवरी 1992 में जब मनमोहन सिंह अपना दूसरा बजट पेश कर रहे थे, तब तक भारत अपना ऋण भुगतान में चूक का कलंक मिटाने में सफल हो चुका था. विदेशी मुद्रा भंडार सुधर कर 11,000 करोड़ रुपये पर आ गया था और 1991-92 में वित्तीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 6.5% के भीतर आ गया था.

18 वर्षों के बाद, भारत ने अपना स्वर्ण वापस खरीद लिया और आज देश के पास 557.8 मीट्रिक टन स्वर्ण भण्डार है जो 1991 में उपलब्ध भण्डार से काफी ज्यादा है. यह इस कहावत से मेल खाता है कि कुछ बदलाव के लिए कुछ अव्यवस्था ज़रूरी होती है.

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