17 Aug 2018

त्रिचुर – भारत की स्वर्ण राजधानी

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Know the Story Behind Why Thrissur is called the - Gold Capital of India

क्या आप जानते हैं कि भारत में बेचे गए सभी स्वर्ण आभूषणों का 30% त्रिचुर में बनाया जाता है? इसके अलावा, केरल के लगभग सभी बड़े जौहरी जिनके खुद के उत्पादन यूनिट नहीं हैं, अपना काम करीब 3000 छोटे यूनिट्स से करवाते हैं, जिससे त्रिचुर के आस-पास के लगभग 40,000 कारीगरों को नौकरी मिलती है।

ज़ाहिर सी बात है, त्रिचुर का स्वर्ण बाज़ार केरल राज्य की आय का प्रमुख ज़रिया है। इसमें आश्चर्य की बात नहीं है कि भारत के चुनिंदा सबसे बड़े स्वर्ण विक्रेताओं के मुख्यालय इस शहर में मौजूद हैं, जिससे यह भारत में सोने के व्यापार और उद्योग का केंद्र बन जाता है। स्थानीय व्यवसायीओं को भारत के सबसे धनी लोगों में बदलने में सोने ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

व्यवसायी भावना

ऐसा कहा जाता है कि त्रिचुर के लोगों के मन में व्यवसायी भावना के बीज राजा सक्थन थम्पूरन ने बोए थे, जिन्होनें 18वे शतक में त्रिचुर को अपनी राजधानी बनाई थी। अपने व्यवसाय कौशल के लिए प्रख्यात सीरिया के कई ईसाई परिवारों को उन्होनें आमंत्रित किया कि वे त्रिचुर में आकर व्यवसायों की स्थापना करें। टीक, फर्नीचर और सोना सबसे आम स्थापित व्यवसायों में से थे। हालांकि अन्य उद्यमों ने भी विस्तार और विकास किया है, मगर सोना सब पर हावी है। आज भी शहर के कई स्वर्ण जौहरी उन परिवारों से जुड़े हुए हैं जो सक्थन थम्पूरन के निमंत्रण पर पहुँचे थे। ज़ाहिर है, भारत के कुछ सबसे बड़ी आभूषण कम्पनियों के मुख्यालय त्रिचुर में मौजूद हैं।

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सिल्क मार्ग

भारत के स्वर्ण राजधानी के रूप में त्रिचुर के विकास में योगदान देने वाला एक और कारक यह है कि सिल्क मार्ग में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए त्रिचुर ने एक प्रमुख स्टॉपओवर के रूप में अपना योगदान दिया है। अपनी यात्रा के दौरान रोमन और अरब व्यापारी त्रिचुर के पार कोडुंगालुर के बंदरगाह पर रुकते थे। हालांकि यह व्यापार धीरे-धीरे खत्म होता गया, इसने सोने और उसके आभूषणों में कारीगरी विशेषज्ञता की गहरी छाप छोड़ी। अब कोडुंगालुर में 1 कि.मी. दूरी पर ही 100 से अधिक आभूषण की दुकाने हैं।

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सरकार की तरफ से बढ़ावा

1990 में भारत सरकार द्वारा किए गए नीतिगत परिवर्तन से अधिक बढ़ोतरी मिली, जिससे शहर में आभूषण दुकनों की संख्या में वृद्धि हुई।

  • गोल्ड कंट्रोल एक्ट को लागू करना (व्यक्तिगत सोने की बिक्री और होल्डिंग पर बंधन लगाना)
  • एनआरआई को देश में 5 किलो (बाद में बढ़ कर 10 किलो) तक सोना लाने की अनुमति दे देना
  • फॉरेन एक्सचेंज रेगुलेशन एक्ट, 1973 में प्रावधानों को शामिल करना

हालांकि पहले केवल स्वर्ण जौहरी और व्यापारी इस उद्योग पर राज करते थे, इन नीतिगत परिवर्तनों के बाद कई परिवारों ने भी स्वर्ण आभूषणों के कारोबार शुरु कर दिए।

आज की स्थिति

त्रिचुर के सबसे व्यस्त इलाकों में से एक, हाई रोड पर दोनों तरफ स्थित छोटी स्थानीय दुकानें सोने के गहने बेचती हैं। सही दाम पर सोने के आभूषण खरीदने वाले स्थानीय लोगों एवं पर्यटकों के लिए यह मार्ग बहुत लोकप्रिय है। पूरा शहर हाइवे, इमारतों, पब्लिक ट्रांस्पोर्ट और फ्लाईओवर पर मौजूदा एवं आने वाले सोने के गहनों की दुकानों के होर्डिंग, बैनर, पोस्टर, फ्लेक्स और पेंट किए हुए विज्ञापनों से परिपूर्ण हो जाता है।

त्रिचुर केरल के किसी भी अन्य शहर की तरह दिखता है, लेकिन स्वर्ण के प्रति इसका लगाव ही इसे सबसे अलग करता है। इसलिए इसे सही रूप से 'भारत की स्वर्ण राजधानी' कहा जाता है क्योंकि यह देश के श्रेष्ठ सोने के केंद्रों में से एक है।

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